एक ही मीटिंग में दिखे सोनिया गाँधी और पीएम नरेंद्र मोदी, बड़ी ख़ास है वजह

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अभी की बात की जाए तो वैसे तो नरेंद्र मोदी जी देश की राजनीति के पुरोधा है और कही न कही उनके नाम और उनके रूतबे से ही पूरी सरकार भी चलते हुए नजर आती है लेकिन क्योंकि अभी आज की तारीख में इस देश में लोकतंत्र है तो फिर ऐसे में एक बात भी है कि बिना विपक्ष की रजामंदी के ठीक तरीके से सदन को चला पाना भी मुश्किल ही होता है. बस इसी कारण से आपस में ये लोग सामंजस्य बनाकर के चला करते है और ये हम लोगो ने फिर से देखा है.

ओम बिरला की अध्यक्षता में मीटिंग, कामकाज को गति देने पर हुई बात
लोकसभा के अध्यक्ष और जाने माने नेता ओम बिरला ने हाल ही में एक मीटिंग बुलाई जिसमे प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और विपक्ष के कई नेता जैसे अधीर रंजन चौधरी और सोनिया गांधी आदि भी शामिल हुए थे. इस मीटिंग को बुलाने का उद्देश्य असल में सिर्फ एक ही था कि सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाए जाने के लिए आपस में राजनीतिक पार्टियों में आपसी समझ खड़ी की जाये. कही न कही इसी वजह से पीएम मोदी और सोनिया गांधी दोनों ही एक मीटिंग में शामिल भी हुए थे.

इस बार सिर्फ 22 फीसदी काम ही हो पाया है
अगर हम बात करे काम काज की तो जिस तरह से विपक्ष बीच में अड़ंगे लगा रहा है उसके कारण से सदन में काम ठीक तरह से हो नही पा रहा है और इस बार के मानसून सत्र में अब तक काम का सिर्फ 22 फीसदी काम ही हो पाया है और अगर इसी तरह से हालात चलेंगे तो फिर देश में बाकी चीजे सुचारू रूप से कैसे चल जायेगी? शायद इसी वजह से एक फ्रेम में हमने मोदी जी और सोनिया गांधी को देखा है.

अब इनके बीच में आपसी समझ और सुलह किस हद तक बन पाती है ये तो हमें अगले सदन के सेशनो में पता चल ही जाएगा क्योंकि जिस तरह से अभी की बात की जाये तो अब तक तो ऐसा हो नही पाया है लेकिन क्या ओम बिरला के मनाने पर सब पार्टियाँ मान जाती है और जिस तरह से पीएम ने खुद मीटिंग के लिए वक्त निकालकर के एक अच्छी पहल करने की कोशिश की है उसके बाद में तो विपक्षियो को मान ही जाना चाहिए.

क्योंकि इसके कारण नुकसान देश की जनता का ही होता है. अगर विपक्ष के हंगामे के कारण से सदन नही चल पाता है तो फिर कई महत्त्वपूर्ण बिल जो देश में बदलाव लाने में काबिल साबित हो सकते है वो आ ही नही पाते है.

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