जिन्दगी में पैसे वाला और सफल बनना है तो आज ही छोड़ दे ये आदते

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द्वापर युग की महाभारत मात्र एक ग्रंथ नहीं, अपितु ज्ञान का वह सागर है जिसका अध्धयन करने से जिससे कोई भी मनुष्य जीवन में आए दिन आने वाली परेशानियों से सरलता से निपट सकता है।
महाभारत की विदुर नीति के अंतर्गत ही एक ऐसा श्लोक है जो मनुष्य के उन दोषों के बारे में वर्णन करता है जो सफल और सुखमय जीवन व्यतीत करने में बाधा उत्पन्न करते हैं।
श्लोक इस प्रकार है-
“ईर्ष्या घृणो न संतुष्ट: क्रोधनो नित्यशङ्कित:। परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदु:खिता:”
इस श्लोक में मानव के जिन छह दोषों के बारे में बताया गया है, आइऐ उनके बारे में विस्तार से जानते हैं।

ईर्ष्या : दूसरे के धन-ऐश्वर्य, यश, प्रसन्नता आदि को देखकर ईर्ष्या करनेवाला मनुष्य कभी प्रसन्नचित्त नहीं रहता। इस प्रकार का मनुष्य दूसरों के साथ साथ स्वयं के लिए भी हानिकारक होता है तथा कभी सुखी नहीं रहता।

घृणा : अन्य लोगों को स्वयं से नीचा अथवा घृणत भावना से देखने वाला मनुष्य कभी जीवन में मित्रता आदि संबंधों में सफल नहीं हो पाता और कष्टमय एकांकी जीवन व्यतीत करता है।

क्रोध : क्रोध को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। क्रोधवश लिया गया निर्णय बहुत बार घातक सिद्ध होता है। मनुष्य को चाहिए की वह क्रोध को नियंत्रित करना सीखे और गुस्से के समय चुप्पी रखना सीखें।

असंतोष : संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जो व्यक्ति संतोषी होता है, वह सीमित संसाधनों में भी सुखी जीवन व्यतीत करता है। वहीं दूसरी ओर, असंतोषी व्यक्ति सब प्रकार के धनों से परिपूर्ण होते हुए भी दुखी रहता है। कबीरदास ने भी कहा है-
‘गो धन, गजधन, बाजि धन और रतन धनखान
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान।’

संदेह : संदेह या शक एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई ईलाज नहीं है। ऐसे लोग किसी पर भरोसा करने में असमर्थ रहते हैं।

पराश्रितता : दूसरों पर आश्रित रहने वाले लोग अमूमन परेशानियों से घिरे रहते हैं। ऐसे लोगो को हर चीज के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे व्यक्तियों को जीवन के हर मोड़ पर अपने आत्मसम्मान से समझौता करता पड़ता है। आत्मनिर्भरता मनुष्य में आत्मविश्वास का संचार करती है।

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